Wednesday, April 17, 2024

राहुल गांधी की सांसदी जाते ही SC में अर्ज़ी, जघन्य अपराधों में ही सदस्यता रद्द करने की मांग

मानहानि से जुड़े एक मामले में सज़ा को चुनौती देने के लिए राहुल गांधी ऊपरी अदालत में अर्ज़ी देते, इससे पहले ही केरल के एक एक्टिविस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है.

आज अंग्रेज़ी अख़बार द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पन्ने पर सबसे बड़ी ख़बर यही है. ख़बर के अनुसार याचिकाकर्ता आभा मुरलीधरन ने रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ़ पीपल एक्ट की धारा 8(3) को अंसवैधानिक करार देने की मांग की है.

इस धारा के तहत ही किसी राजनेता को कम से कम दो साल की सज़ा होने पर उनकी सांसदी या विधायकी चली जाती है.

गुरुवार को सूरत की एक अदालत ने राहुल गांधी को आपराधिक मानहानि केस में दो साल की सज़ा दी थी. इसके अगले ही दिन राहुल गांधी की संसद की सदस्यता को रद्द कर दिया गया था.

राहुल गांधी केरल की वायनाड लोकसभा सीट से सांसद थे. साल 2019 में राहुल ने अमेठी के साथ ही वायनाड से भी चुनाव लड़ा था. हालांकि, वो अमेठी से चुनाव हार गए थे.

अख़बार के अनुसार, कांग्रेस ने राहुल गांधी की सदस्यता जाने में दिखाई गई तेज़ी पर सवाल उठाए थे. अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका देने वाली सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा है कि केवल गंभीर और जघन्य मामलों में दोषी ठहराए जाने वाले राजनेताओं की सदस्यता जानी चाहिए.

सामाजिक कार्यकर्ता आभा मुरलीधरन ने अपनी अर्ज़ी में कहा है कि धारा 8(3) संविधान के अधिकार से बाहर है क्योंकि यह संसद के एक निर्वाचित सदस्य (सांसद) या विधान सभा के सदस्य (विधायक) के साथ ही उसके पूरे चुनावी क्षेत्र की अभियव्यक्ति की आज़ादी को कम करती है और क़ानून बनाने वालों को अपने कर्तव्यों को स्वतंत्र रूप से निभाने से रोकती है.

उन्होंने इस धारा को मनमाना और एकतरफ़ा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से इसे निरस्त करने की मांग की है. साथ ही शीर्ष न्यायालय से एक डिक्लेरेशन भी जारी करने को कहा है, जिसमें ये कहा जाए कि आपराधिक मानहानि केस में अधिकतम सज़ा पाने वाले नेताओं की सदस्यता स्वतः नहीं जानी चाहिए.

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि साल 2013 में लिली थॉमस मामले में दिए गए आदेश पर एक बार फिर से ग़ौर करने की ज़रूरत है. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि लिली थॉमस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का राजनीतिक पार्टियां प्रतिशोध के लिए दुरुपयोग करती हैं.

साल 2005 में केरल की वकील लिली थॉमस और एनजीओ लोक प्रहरी के महासचिव एसएन शुक्ला ने शीर्ष अदालत में एक जनहित याचिका दायर कर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) को चुनौती दी थी, जो कोर्ट में लंबित अपीलों के कारण सज़ायाफ़्ता विधायकों को अयोग्यता से बचाता था.

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 102(1) और 191(1) का भी हवाला दिया गया था. अनुच्छेद 102(1) में सांसद और 191(1) में विधानसभा या विधान परिषद को अयोग्य ठहराने का प्रावधान है.

साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि अगर कोई विधायक, सांसद या विधान परिषद सदस्य किसी भी अपराध में दोषी पाया जाता है और इसमें उसे कम से कम दो साल की सज़ा होती है तो ऐसे में वो तुरंत अयोग्य घोषित माना जाएगा. शीर्ष न्यायालय ने ये भी कहा था कि केंद्र के पास धारा 8 (4) को लागू करने का अधिकार नहीं है.

चिप की कमी के कारण नए EVM बनने में हो रही देरी- चुनाव आयोग

चुनाव आयोग ने 31 जनवरी तक नई इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के लिए मिलने वाले बजट का केवल 16 फ़ीसदी हिस्सा ही खर्च किया है. इसके पीछे दुनियाभर में सेमिकंडक्टर की कमी को वजह बताया गया, जिससे मशीन बनाने में देरी हो रही है.

अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, चुनाव आयोग ने इसी साल फ़रवरी में संसद की एक समिति को इस बारे में जानकारी दी है. ये आंकड़े साल 2022-23 के बजट के हैं.

चुनाव आयोग ने पर्सनल, पब्लिक ग्रिवांसेज़, लॉ एंड जस्टिस पर संसद की स्थायी समिति को बताया है कि वो नई ईवीएम मशीनों के लिए आवंटित 1500 करोड़ रुपये की राशि इस वित्त वर्ष के आख़िर (31 मार्च) तक ख़र्च कर लेगा.

भाजपा सांसद सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता वाली समिति ने क़ानून और न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग की अनुदान की मांग (2023-2024) पर अपनी रिपोर्ट 20 मार्च को लोकसभा में पेश की. इसी विभाग के माध्यम से चुनाव आयोग को अनुदान मिलता है.

इस रिपोर्ट में बताया गया है, “ईवीएम खरीदने के लिए 2021-2022 में एक हज़ार करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई थी. इसे 2022-23 के लिए बढ़ाकर 1500 करोड़ रुपये कर दिया गया और 2023-24 के लिए ये अनुदान 1866.788 करोड़ रुपये तक बढ़ाया गया है. अगले साल यानी 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए नई ईवीएम खरीदने के लिए ये प्रावधान किया गया है.”

आवंटित 1500 करोड़ रुपये में से विभाग ने 31 जनवरी तक 240.86 करोड़ रुपये खर्च किए थे. चुनाव आयोग ने समिति को ये भी बताया कि 598.84 करोड़ रुपये के बिल पास करवाने के लिए क़ानून मंत्रालय के पास भेजे गए हैं और एक बार ये पास हो जाएंगे तो ईवीएम निर्माताओं को भुगतान किया जाएगा.

चुनाव आयोग ने ये भी बताया कि दुनियाभर में सेमी-कंडक्टर (ईवीएम और VVPAT बनाने के लिए ज़रूरी सामान) की कमी की वजह से भी ईवीएम बनने में देरी हो रही है. हालांकि, इस वित्त वर्ष के आख़िर तक बजट में आवंटित राशि इस्तेमाल कर ली जाएगी.

अकाल तख्त के जत्थेदार ने अमृतपाल सिंह को दी आत्मसमर्पण की सलाह

श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने फ़रार करार दिए गए अमृतपाल सिंह को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण की सलाह दी है.

अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा, “अगर अमृतपाल पुलिस के कब्ज़े से बाहर है, तो मैं उन्हें कहूंगा कि वो पुलिस के सामने पेश हों और जाँच में सहयोग करें.”

जत्थेदार हरप्रीत सिंह का ये बयान तब आया है जब पंजाब पुलिस के ख़ुफ़िया प्रमुख इंस्पेक्टर जनरल जसकरण सिंह ने उनसे एक दिन पहले ही मुलाक़ात की थी.

पुलिस के अनुसार, अमृतपाल सिंह और उनके सहयोग पपलप्रीत 18 मार्च से फ़रार हैं. पंजाब पुलिस ने 18 मार्च को ही ख़ालिस्तान समर्थक संगठन ‘वारिस पंजाब दे’ और उसके सदस्यों पर कार्रवाई शुरू की थी.

सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे वीडियो में ज्ञानी हरप्रीत सिंह कह रहे हैं, “दुनिया के हर सिख के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी भारी संख्या में पुलिसबल की तैनाती के बावजूद अमृतपाल सिंह अब तक कैसे नहीं पकड़ा जा सका. ये पुलिस की काबिलियत पर सवाल खड़े करता है.”

“अगर अमृतपाल गिरफ़्तार हो गया है, तो पुलिस को ये बताना चाहिए. अगर अमृतपाल हिरासत में नहीं है तो उसे ख़ुद को पुलिस के सामने पेश करना चाहिए. उसे पुलिस से पूछना चाहिए कि वो क्या करना चाहती है. पुलिस को भी ये ध्यान रखना चाहिए कि हमारे युवाओं ने कोई जघन्य अपराध नहीं किया, जैसा मीडिया में दिखाया जा रहा है.”

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