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रिहाना-ग्रेटा ने किसान आंदोलन का किया समर्थन तो बोले राहुल गांधी- यह हमारा आंतरिक मामला

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National Desk : लोकप्रिय पॉप स्टार रिहाना, जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग समेत कई अंतरराष्ट्रीय सेलिब्रिटीज के किसान आंदोलन का समर्थन करने पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे आंतरिक मामला बताते हुए कहा है कि यह किसानों का मामला है और कानूनों को वापस लेना होगा। मालूम हो कि मंगलवार को 32 वर्षीय रिहाना ने किसान आंदोलन का सबसे पहले समर्थन किया था, जिसके बाद कई अन्य अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेलिब्रिटीज ने सपोर्ट किया। रिहाना ने सीएनएन के एक लेख के साथ ट्वीट किया कि हम इसके बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं? हैशटैग किसान आंदोलन। उस आर्टिकल में किसान आंदोलन के बीच नई दिल्ली के आसपास इंटरनेट बंद करने की जानकारी थी।

केरल के वायनाड से सांसद और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर से केंद्र सरकार से कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए कहा। उन्होंने समस्या का जल्द से जल्द समाधान निकालने की अपील की। उन्होंने यह सवाल भी किया कि सरकार दिल्ली में किलेबंदी क्यों कर रही है? कांग्रेस नेता ने संवादददाताओं से कहा, ”सबसे पहला सवाल यह है कि सरकार किलाबंदी क्यों कर रही है? क्या ये किसानों से डरते हैं? क्या किसान दुश्मन हैं? किसान देश की ताकत है। इनको मारना, धमकाना सरकार का काम नहीं है। सरकार का काम बातचीत करना और समस्या का समाधान निकालना है।”

राहुल गांधी बोले- किसान पीछे नहीं हटेंगे
किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि किसान किसी भी सूरत में पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा,  ”प्रधानमंत्री कहते हैं कि प्रस्ताव बरकरार है कि कानूनों के क्रियान्वयन को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया जाए। मेरा मानना है कि इस समस्या का समाधान जल्द करना जरूरी है। किसान पीछे नहीं हटेंगे। अंत में सरकार को पीछे हटना पड़ेगा। इसमें सबका भला है कि सरकार आज ही पीछे हट जाए।” प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब राहुल गांधी से एक पत्रकार ने सवाल पूछा कि कई अंतरराष्ट्रीय सेलिब्रिटीज ने किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट किया है और उस पर विदेश मंत्रालय ने प्रतिक्रिया दी है। इस सवाल पर राहुल गांधी ने जवाब दिया, ”इसमें मुझे कोई इंटरेस्ट नहीं है। मेरा कोई ओपिनियन नहीं है। यह हमारा आंतरिक मामला है। किसानों का मामला है और बात साफ है कि इन कानूनों को वापस लेना होगा।”

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विदेशी सेलिब्रिटीज को केंद्र सरकार ने दिया करारा जवाब
वहीं, भारत ने किसानों के प्रदर्शन पर पॉप स्टार रिहाना सहित विदेशों की मशहूर सेलिब्रिटीज एवं अन्य लोगों की टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि कृषि सुधारों के बारे में देश के किसानों के एक बहुत ही छोटे वर्ग को कुछ आपत्तियां हैं और विरोध प्रदर्शन के बारे में टिप्पणी करने की जल्दबाजी से पहले तथ्यों की जांच परख की जानी चाहिए। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि  खास तौर पर मशहूर हस्तियों एवं अन्य द्वारा सोशल मीडिया पर हैशटैग और टिप्पणियों को सनसनीखेज बनाने की ललक न तो सही और न ही जिम्मेदाराना होती है। इसमें कहा गया है कि कुछ निहित स्वार्थी समूहों ने भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का प्रयास किया। बयान में आगे कहा गया है कि हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि इन प्रदर्शनों को भारत के लोकतांत्रिक आचार और राजनीति के संदर्भ और सरकार के संबंधित किसान समूहों से गतिरोध दूर करने के प्रयासों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

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देश-विदेश

विजय मार्च निकाल कल आंदोलन खत्म करेंगे किसान, मोदी सरकार की नरमी से बनी बात?

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National Desk : बीते एक साल से ज्यादा वक्त से चला आ रहा किसान आंदोलन बुधवार को समाप्त हो सकता है। मंगलवार को सिंघु बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में इसे लेकर संकेत मिले हैं। केंद्र सरकार की ओर से लंबित मुद्दों के समाधान के लिए ड्राफ्ट सौंपे जाने के बाद इस पर सहमति बनती दिखी है। आंदोलन कर रहे किसानों की मुख्य मांगें तीनों कानूनों को वापस लेने की थी। केंद्र सरकार ने उनकी मांगों को मानते हुए तीनों कानूनों को संसद के जरिए वापस ले लिया। इसके अलावा भी किसानों की कई मांगें लंबित थे। उनमें आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने और एमएसपी पर गारंटी देने की मांग प्रमुख थी।

अब केंद्र सरकार की ओर से किसानों को एक ड्राफ्ट भेजा गया है। इस ड्राफ्ट में सरकार ने पराली जलाने पर आपराधिक धाराएं खत्म करने की बात कही है। इसके अलावा हरियाणा और यूपी में किसान आंदोलन के दौरान दर्ज हुए सभी मामले वापस होंगे। दोनों राज्यों की सरकारों ने इस पर सहमति जताई है। यही नहीं केंद्र और केंद्र शासित प्रदेशों में भी किसानों पर दर्ज सभी केस वापस होंगे। केंद्र सरकार के इस रुख के बाद ही किसान आंदोलन समाप्त करने का फैसला ले सकते हैं। यही नहीं 8 दिसंबर को किसानों की ओर से विक्ट्री मार्च भी निकाला जा सकता है।

आपको बता दें कि संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने 4 दिसंबर को सभी विरोध करने वाले किसानों की ओर से सरकार के साथ बातचीत करने के लिए अधिकार प्राप्त समिति का हिस्सा बनने के लिए पांच लोगों का चयन किया। केंद्र सरकार द्वारा तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त करने की प्रमुख मांग को स्वीकार किए जाने के बाद भी किसानों के मुद्दों पर केंद्र के साथ चर्चा करने के लिए इस समिति का गठन किया गया था।

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आज की मीटिंग हुई खत्म, अब कल फिर से होगी बात: संयुक्त किसान मोर्चा

इस बीच संयुक्त किसान मोर्चा की सिंघु बॉर्डर पर चल रही मीटिंग समाप्त हो गई है, लेकिन फिलहाल कोई ऐलान नहीं किया गया है। किसान नेताओं ने कहा कि सरकार की ओर से भेजे गए कुछ प्रस्तावों पर स्पष्टीकरण की जरूरत है। मीटिंग में सभी प्रस्तावों पर लंबी चर्चा हुई है। अब कल यानी 8 दिसंबर को दोपहर 2 बजे फिर मीटिंग बुलाई जाएगी। जिन बिंदुओं पर हमें स्पष्टीकरण की जरूरत है, उसे लेकर सरकार से बात की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट में टली सुनवाई, सड़कों के जाम का उठा था मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के विरोध के कारण दिल्ली से नोएडा के बीच सड़कों की नाकेबंदी के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई जनवरी 2022 तक के लिए टाल दी है। जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुरोध पर मामले को स्थगित कर दिया, जिन्होंने कहा कि उन्हें “हालिया घटनाक्रम” (तीन कृषि कानूनों को निरस्त) के मद्देनजर निर्देश लेने की जरूरत है। इस मामले में किसान संघों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील प्रशांत भूषण ने मामले की सुनवाई जनवरी में करने का अनुरोध किया।

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देश-विदेश

माेदी सरकार ‘Work From Home’ के लिए कानून लाएगी, काम के घंटे तय करना और बिजली और इंटरनेट के लिए भुगतान पर रहेगा जोर

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National Desk : केंद्र सरकार वर्क फ्रॉम होम (घर से काम) को लेकर एक व्यापक कानून बनाने की तैयारी कर रही है। नया कानून घर से काम कर रहे कर्मचारियों के प्रति कंपनियों की जिम्मेदारी को तय करेगा। इस घनाक्रम से जुड़े दो सरकारी अधिकारियों ने यह जानकारी दी है।

गौरतलब है कि कोरोना महामारी के बाद से कंपनियों ने अपने कर्माचरियों को कोविड-19 संक्रमण से बचाने के लिए अधिकतर कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम या हाइब्रिड मॉडल अपनाया। बीते साल यानी 2020 में इसे एक अस्थायी उपाय के रूप में देखा गया, लेकिन अब यह काम करने का नया मॉडल बन गया है। ऐसे में सरकार इस नए कामकाजी मॉडल को लेकर एक कानूनी ढांचा बनाना चाहती है। एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि जिन विकल्पों पर विचार किया जा रहा है उनमें कर्मचारियों के लिए काम के घंटे तय करना और घर से काम करने के दौरान अतिरिक्त खर्च होने वाले बिजली और इंटरनेट के लिए कर्मचारियों को भुगतान करना शामिल है।

परामर्श कंपनी को भी शामिल किया गया

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अधिकारी ने बताया, घर से काम के लिए एक पॉलिसी बनाने में मदद के लिए एक कंसल्टेंसी फर्म को भी शामिल किया गया है। इससे पहले सरकार ने जनवरी में एक स्टैंडिंग ऑर्डर के जरिए सर्विस सेक्टर में ‘वर्क फ्रॉम होम’ को औपचारिक रूप दिया था, जिसके तहत कंपनी और कर्मचारी आपसे में मिलकर काम के घंटे और दूसरी चीजें तय कर सकते हैं। हालांकि, सरकार के इस कदम को सिर्फ एक सांकेतिक अभ्यास के तौर पर देखा गया था, क्योंकि आईटी सहित सर्विस सेक्टर की तमाम कंपनियां पहले से ही अपने कर्मचारियों को विशेष परिस्थितियों के तहत ‘वर्क फ्रॉम होम’ देती रही हैं।

व्यापक औपचारिक ढांचा बनाने की योजना

कोरोना के बाद बदले दौर में अब सरकार सभी सेक्टर्स में ‘वर्क फ्रॉम होम’ को लेकर व्यापक औपचारिक ढांचा तय करना चाहती है। इसका उद्देश्य बदले हालत में कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है। दरअसल मार्च 2020 में कोरोना वायरस के देश में दस्तक देने के बाद से वर्क फ्रॉम होम का चलन चल पड़ा है। कई कंपनियों में अभी भी वर्क फ्रॉम होम के तहत कर्मचारी घर से काम कर रहे हैं। अब तो कोरोना वायरस का नए वैरिएंट ओमीक्रॉम भी आ गया है तो माना जा रहा है फिर से कंपनियां अपने कर्मचारियों को घर से काम करने के लिए कह सकती है।

कई देशों में है पहले से कानून

बता दें कि भारत के अलावा इस समय दुनिया के तमाम देशों में भी ‘वर्क फ्रॉम होम’ को लेकर नियम-कानून बनाए जा रहे हैं। हाल ही में पुर्तगाल की संसद ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ को लेकर एक कानून पास किया है, जिसके तहत कोई कंपनी अपने कर्मचारी को उसकी शिफ्ट खत्म होने के बाद कॉल या मैसेज नहीं कर सकती है। ऐसा करने पर कंपनी पर जुर्माने का प्रावधान है। कोरोना के बाद बहुत सारे कर्मचारियों की शिकायतें रही हैं कि उनसे ज्याद घंटे काम लिया जा रहा है। कई बार उन्हें अपने बॉस के बेवजह गुस्से का शिकार होना पड़ा है। इसको देखते हुए यह कानून लाने की तैयारी है।

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CORONA VIRUS

ओमिक्रॉन वैरिएंट और भी जानलेवा होगा! Covishield बनाने वाले वैज्ञानिक की चेतावनी- Omicron से लड़ने में वैक्सीन कम प्रभावी

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National Desk : कोविड-19 के ओमिक्रॉन वैरिएंट ने दुनिया के कई देशों की चिंता बढ़ा रखी है। इस बीच कोविशील्ड वैक्सीन बनाने वाले वैज्ञानिक ने चेताया है कि अगला वायरस और भी जानलेवा हो सकता है। ऑक्सफोर्ड-एस्ट्रेजेन्का वैक्सीन जिसे भारत में कोविशील्ड के नाम से जाना जाता है को बनाने वाले वैज्ञानिक ने कहा कि अगला वायरस कोविड क्राइसिस से ज्यादा खतरनाक हो सकता है।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सारा गिलबर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि वैक्सीन नये वैरिएंट ओमिक्रॉन के लिए कम प्रभावी साबित हो सकती है। प्रोफेसर सारा गिलबर्ट ने कहा कि महामारी से भविष्य में बचाव और इससे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए ज्यादा फंडिंग की भी जरुरत है। प्रोफेसर ने कहा, ‘यह कोई अंतिम मौका नहीं है जब किसी वायरस की वजह से लोग दहशत में आए हैं और इसकी वजह से जानें जा रही हैं। सच्चाई यह है कि अगला इससे भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। यह ज्यादा संक्रामक, ज्यादा जानलेवा या फिर दोनों हो सकता है।’

उन्होंने कहा, ‘इस महामारी ने हमें जो पाठ पढ़ाया है हम उसे कभी भूला नहीं सकते। अब हम वैसे हालात पैदा नहीं होने दे सकते जिससे हम गुजर चुके हैं। इसके बाद आर्थिक नुकसान जो हुआ है उससे उबरने के लिए ज्यादा फंडिंग की जरुरत होगी।’ उन्होंने कहा कि जब तक यह पता नहीं चल जाता कि नए वैरिएंट से लड़ने में वैक्सीन कितना कारगर है तब तक हमें ज्यादा सुरक्षात्मक उपायों को अपनाना चाहिए।

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इधर वैज्ञानिकों ने यह भी आशंका जताई है कि सार्स-कोवी-2 के नये स्वरूप ओमीक्रोन से कोरोना वायरस महामारी की तीसरी लहर फरवरी में चरम पर पहुंच सकती है, जब देश में प्रतिदिन एक लाख से डेढ़ लाख तक मामले सामने आने की संभावना है। कोविड-19 के गणितीय अनुमान में शामिल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिक मनिंद्र अग्रवाल ने यह कहा है। उन्होंने कहा कि नये अनुमान में, ओमीक्रोन स्वरूप को एक कारक के तौर पर शामिल किया गया है।

अग्रवाल ने पीटीआई-भाषा से कहा, ”नये स्वरूप के साथ, हमारा मौजूदा अनुमान यह है कि देश में फरवरी तक तीसरी लहर आ सकती है लेकिन यह दूसरी लहर से हल्की होगी। अब तक हमने देखा है कि ओमीक्रोन से होने वाले संक्रमण की गंभीरता डेल्टा स्वरूप की तरह नहीं है। ”

हालांकि, उन्होंने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में सामने आए मामलों पर करीबी नजर रखी जा रही है, जहां इस नये स्वरूप के कई मामले सामने आए हैं। अग्रवाल ने कहा कि फिलहाल दक्षिण अफ्रीका में संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होने की दर में वृद्धि नहीं दिखी है। उन्होंने कहा कि वायरस और अस्पताल में भर्ती होने की दर पर नये आंकड़ों से स्थिति की कहीं अधिक स्पष्ट तस्वीर मिलेगी।

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